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Aditya Mishra का दक्षिण कोरिया के "मे 18 अकादमी 2025" के लिए चयन

संपादकीय टीम 27 अगस्त 2025 को 02:05 pm बजे
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Aditya Mishra – लोकतंत्र और मानवाधिकार की वैश्विक आवाज़ बनेगा बनारस का युवा विधि छात्र

वाराणसी। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के बी.ए. एलएल.बी. (ऑनर्स) छात्र आदित्य मिश्रा का चयन दक्षिण कोरिया के ग्वांग्जू स्थित मे 18 फाउंडेशन द्वारा आयोजित “मे 18 अकादमी – 2025” के लिए किया गया है। यह आयोजन 25 से 29 अगस्त तक चलेगा, जिसमें अमेरिका, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, थाईलैंड, नेपाल, चीन सहित 16 देशों के प्रतिभागी शामिल होंगे। भारत का प्रतिनिधित्व आदित्य मिश्रा करेंगे।

ग्वांग्जू विद्रोह से प्रेरित अकादमी

दक्षिण कोरिया का ग्वांग्जू विद्रोह (मई 1980) लोकतंत्र की लड़ाई का ऐतिहासिक प्रतीक माना जाता है। इसी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए मे 18 अकादमी हर वर्ष दुनिया भर के चुनिंदा युवाओं, विधि विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को आमंत्रित करती है। इस बार भारत से आदित्य मिश्रा का चयन हुआ है, जिसे लोकतंत्र और मानवाधिकार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

Aditya Mishra मानवाधिकार कार्यों में सक्रिय

Aditya Mishra ने अपने क़ानूनी और सामाजिक कार्यों की शुरुआत पीपुल्स विजिलेंस कमेटी ऑन ह्यूमन राइट्स (PVCHR), जन मित्र न्यास (JMN) और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA), प्रयागराज के साथ की।
उन्होंने—

हिरासत में हिंसा व यातना पर शोध,

आपराधिक कानून सुधारों का तुलनात्मक अध्ययन (IPC–BNS व CrPC–BNSS),

हिंसा पीड़ितों की गवाही दर्ज करना,

स्वास्थ्य अधिकार, किचन गार्डन और दलित–आदिवासी समुदायों में विधिक सशक्तिकरण—
जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया।

बिना साक्षात्कार चयन

विशेष बात यह है कि मे 18 अकादमी ने इस बार Aditya Mishra को सीधे उनके आवेदन पत्रों के आधार पर चुना और साक्षात्कार चरण को माफ कर दिया। इसे उनकी प्रतिबद्धता, गहनता और मानवाधिकार चेतना की अंतरराष्ट्रीय मान्यता के तौर पर देखा जा रहा है।

भारत से ग्वांग्जू तक की आवाज़

ग्वांग्जू में आदित्य स्मृति संरक्षण, संक्रमणकालीन न्याय और लोकतांत्रिक आंदोलनों पर विमर्श करेंगे। उनकी भागीदारी से दक्षिण एशिया की आवाज़ को वैश्विक लोकतांत्रिक संवाद में सशक्त पहचान मिलेगी।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि Aditya Mishra का चयन न केवल वाराणसी या भारत, बल्कि पूरी दुनिया में लोकतंत्र और न्याय के लिए संघर्ष करने वालों के लिए गर्व का क्षण है।